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Veer Chandra Singh Garhwali : जानिए इनकी जिंदगी के कुछ किस्से

Veer Chandra Singh Garhwali
Written by knowledgehindime

Veer Chandra Singh Garhwali का जन्म 25 दिसम्बर 1981 को मासी गावं पट्टी थैलीसैन पौड़ी गढ़वाल में हुआ था. इनके पिता का नाम जलौथ सिंह था. 23 साल की उम्र में सन 1914 को Veer Chandra Singh Garhwali सेना में भर्ती हुए. सेना में रहते हुए इन्होने गढ़वाली सैनिक के तौर पर प्रथम विश्व युद्ध, 1918 बगदाद की लड़ाई, मेसोपोटामिया के युद्ध में भी भाग लिया था. सन 1922 में Veer Chandra Singh Garhwali बिट्रिश सेना में हवलदार मेजर के पद पर थे।
Veer Chandra Singh Garhwali

सन 1930 में उस समय की बात है जब इनकी न्युक्ति पेशावर में की गई थी। गफर खाँ के नेतत्व में एक आम सभा का आयोजन किया गया। सभा का लक्ष्य था – शराब की बिक्री बंद करना एवं विदेशी माल का बहिष्कार। सरकार को भनक लगते ही आम सभा न होने का निर्णय लिया गया फिर भी मुख्य सभा का आयोजन मुख्य बाजार में किया गया।

अब्दुल गफ्फार खां वहां पहुंचे। राष्ट्र भक्ति से पूर्ण भाषण प्रारम्भ हुआ। वहां सभी गढ़वाली सैनिक विषय न समझ पा रहे थे किन्तु चन्द्रसिंह ने समझ लिया। इतने में अंग्रेज अफसर ने Veer Chandra Singh Garhwali को गोली चलने का आदेश दे दिया और वह अधिकारी आदेश दे के चले गया।

सैनिकों के पूछने पर चंद्र सिंह गढ़वाली ने कहा अंग्रेज अफसर हमे लड़ना चाहते हैं। हिंदू व मुसलमानो का कोई झगड़ा नहीं है। झगड़ा है तो कांग्रेस और अंग्रेजी सरकार का। क्या हमे अपने भाईओं पर गोली चला देनी चाहिए। यदि ऐंसा ही करना है तो हमे पहले गोली अपने ऊपर चलनी चाहिए। परिणाम यह हुआ की सभा ससम्मान सम्पन हुई।

23 अप्रैल 1930 को चन्द्रसिंह गढ़वाली की पल्टन को काबुली फाटक पर तैनात किया गया। सरकारी फौजें नगर को घेर चुकी थी। यह किस्सा खाना बाजार भी कहा जाता है। यहाँ एक आम सभा होने जा रही थी। अंग्रेज अफसर रिकेट ने चीख -चीख कर नागरिकों को वहां से हट जाने का निर्देश दिया किन्तु कोई टस से मस न हुआ। अंत में गढ़वाली पल्टन को आदेश दिया की तीन राउंड गोली चलाओ किन्तु चन्द्रसिंह ने फायर सीज करने के आदेश दिए।

चन्द्रसिंह ने कड़कड़ाती आवाज में कहा -अपने निहत्थे देशवासियों पर गोली चलना अपराध है। अतः गोली नहीं चलेगी। अंग्रेज अफसर ने बड़े अधिकारिओं से कहकर गढ़वाली पल्टन हटाकर गोरी पल्टन बुलाई। फायर खोल दिया सैकड़ों लोग घायल हो गये। सभा बंग हो गई।

अगले दिन मेज बॉक्सिल ने गढ़वाली सैनिकों को डांटते हुए दूसरे शहर भेजने का निर्णय दिया -“यदि तुम लोगों ने वहां आदेश का पालन कर गोली न चलाई तो सब को गोली मर दी जाएगी”। चन्द्र सिंह गढ़वाली ने अपने सैनिकों को जलियांवाला बाग़ का स्मरण कराया जहाँ अंग्रेजों ने भारतीयों से भारतीयों को मरवाया था। चन्द्रसिंह कहा की हम सैनिक अपने माथे पर कलंक का टिका नहीं लगाएंगे।

अंग्रेजों ने Chandra Singh Garhwali सहित 59 सैनिकों को गिरफ्तार कर फौजी अदालत मुकदमा दर्ज किया गया। पेशावर से एटाबाद पहुँचने के बाद इन सभी को काबुल ले जाया गया। कोर्ट मार्शल में चर्चा प्रारम्भ हुई। 12 जून 1930 को कमांडर चन्द्रसिंह गढ़वाली को 11 साल 18 माह की सजा मिली।

कंटीले तारों की जेल में एक हिन्दू व एक मुसलमान इनसे मिलने गए। ससम्मान इन्हें धोती,दही,जलपान,पगड़ी देकर भेंट की। 11 वर्ष 18 माह बाद जेल से मुक़्त होने पर सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में फिर 7 वर्ष की सजा सुनाई गई।देश की स्वाधीनता के बाद इन्हे मुक्त किया गया। धन्य है Veer Chandra Singh Garhwali जिनके अंदर स्वंतंत्रता की अग्नि ने उन्हें प्रकाश दिखाया। हजारों लोगों को आदेश मिलने पर भी मौत नहीं दी। स्वयं जेल भोगी किन्तु अपने भाइयों पर हथियार नहीं उठाये।

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